Monday, January 5, 2015

अस्तित्व होगा ज़रूर

बहुत समय से सोच रही थी क्यों न हिंदी में भी कुछ लिखू? भाषा प्रबल है चाहे कोई भाषा क्यों न हो।
अक्सर कविताएं मेरे ज़हन में बिलकुल बिना सोचे आ जाती हैं। हम सबका एक अस्तित्वा होता है, पर क्या सबको वह मौका मिल पाता है की वह अपना स्थान बना सकता है ? पर कोशिश क्यों न करेँ ?



समुद्र के किनारे खड़ी चट्टान को मैं देखती रही,
आने वाली लहरों से क्या वह डगमगाती नहीं?

कभी लहरों के नीचे जाती तो कभी कोई भाग मिटटी बन जाता
तेज़ हवा के झोंके, लहरों के थपेड़ो से , चोट तो अवश्य लगती होगी,

फिर भी क्या दर्द का अहसास नहीं ?
लेकिन वही टिके रहना, हिम्मत न हारना, जैसे तय कर लिया है
 शायद यही ठाना है की सामना तो करना है
मिटना तो है ही कभी , अपनी जगह बनाकर ही रहूंगी।

क्यों न मैं भी यह चट्टान बनूँ  , सब कठिनायों का सामना करूं
क्यों मैं रेत की तरह कहीं  खो जाऊ, लगेगी चोट जरूर पर अस्तित्व तो रहेगा।